गुरुवार, 31 मई 2018

लकीरें

बड़ी तंगदिल होती हैं लकीरें...
दिल पर खिंच जाए तो, ताउम्र की रंजिश बन जाती हैं...
कागज़ पर खिंच जाए तो, मुल्क़ का बंटवारा करती है...
ज़मीन पर खिंच जाए तो, परिवार के टूटने का सबब बन जाती है...
चेहरे पर खिंच जाए तो, उम्र का तकाज़ा बन जाया करती हैं...
हाथों में खिंच जाए तो, तक़दीर का इशारा बन जाती हैं...
हर रुप में लकीरें एक नई दास्तान का आग़ाज़ करती हैं...
कभी किसी के ग़ुरूर की क़ीमत चुकाती हैं...
कभी सरहदों पर बेगुनाहों के ख़ून से सींची जाती है..
कभी किसी आंगन के चूल्हे की आग बुझाती है...
तो कभी किसी के दिल के अंगारों को भड़काती है..
कभी किसी मां के कलेजे के कई टुकड़े करवाती है...
कई मासूम ज़िंदगियों पर ये बिजली-सी क़हर ढाती हैं...
कहीं सृजन के बीज बोती है..
कहीं विध्वंस की नींव रखती है...
बनाती है...मिटाती है...बांटती है...जोड़ती है...
क़िस्मत के रूख़ को मोड़ती है...
इतिहास के पन्नों पर भविष्य के संकेत दे जाती है..
ये लकीरें हैं...लकीरें जनाब हर रूप में अपनी छाप छोड़ जाती है।


मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

श्रेष्ठ कौन ?

कभी विचारती हूं..
कि श्रेष्ठ कौन है ?
आध्यात्म का तेज...
या भौतिकता की चमक,
शाश्वत सत्य का भान...
या क्षणिक सुख का मान,
आत्मा का अमरत्व...
या देह का लौकिक तत्व,
अनंत आनंद का मार्ग...
अथवा परिभाषित सुख का पथ,
तप और योग...
या सांसारिक सुख-भोग,
पृथ्वी पर अमर होने की चाह
या फिर अनंत प्रकाश-पुंज में
विलीन होने की राह...

भौतिकता की धरातल
और आध्यात्मिकता के विशाल गगन के बीच
झूल रही हूं मैं,
ज़िंदगी की संकरी रस्सी पर
विश्वास की लकड़ी थाम कर
चल रही हूं मैं,
एक ग़लत क़दम
और अविश्वास का एक पल ही काफी है
इहलोक से उहलोक के सफ़र के लिए...




शीशे की दीवार से सजा नया आशियाना

बालकनी का चांद,
अब शीशे की दीवार के पार से अंदर झांकेगा।
हवा अब अधखुली खिड़कियों से अंदर आया करेगी।
सूरज के दर्शन बालकनी में नहीं,
बल्कि खिड़कियों के झरोखे से होंगे।

आंगन की तुलसी,
अब टंग जाएगी खिड़कियों के किनारे।
इस नए माहौल में
क्या वह खुश रह पाएगी ?
किश्तों में मिली हवा और धूप
उसे ज़िंदा रख पाएगी...
या फिर नए माहौल में
वह मुरझा जाएगी...

अपनी जड़ों से जुदा होकर,
भला टिक पाएगा उसका वजूद ?
लेकिन, जब जड़ें गमलों की मिट्टी से जुड़ीं हों,
तो बदलाव सहज हो जाता है..
थोड़ी दिक्कतों के बाद,
नए माहौल में वह रम जाता है।

ये तो फिर भी गमले में लगी,
बालकनी में रखी तुलसी है।
जुदा तो हम होकर आए हैं,
अपनी जड़ों से, अपने आंगन से
अपने बचपन से, मां के आलिंगन से।
सब पीछे छूट गया और..
हम आगे बढ़ते गए।
अब तो बदलाव ही नियति लगती है,
ठहराव भयभीत करती है।
स्थिरता रास नहीं आती..
और नई चुनौतियां
मन को हैं ललचाती।
पुरानी यादें, वक़्त की सूटकेस में क़ैद हो जाती है
नई मंज़िल को पाने की चाह,
जिंदगी को एक नई राह दिखाती है।






शब्द और भावनाएं

भावना, शब्द से तीव्र गमन करती है
शब्द, भावना को ठहराव देती है
विश्राम का अवसर देती है
...और अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है
पर जब शब्द की गोद,
भावना के आवेग को समेट नहीं पाती
तो वह बह जाती है
कभी संताप के,
कभी पश्चाताप की अश्रुधारा बनकर
तो कभी फूट पड़ती है
आक्रोश की लावा बनकर।
आंखों से लाल अंगारे बरसाती
लाल नथुनों से फुंफकारती
क्रोध से धधकती गर्म श्वासों से
तो कभी दबी रहती सीने में चिंगारी बनकर
भविष्य के प्रलय का बीज बनकर
उसे बुझा सकती केवल
स्नेह-सिक्त शब्दों की वर्षा
जिसमें भींगकर भावनाएँ
शिथिल हो जातीं
अपनी गति पर विराम पाती
फिर शब्दों के आलिंगन में
सिमट कर सुकून पाती।


या फिर उसे शांति देती
उसकी विपरीत भावना
घृणा को प्रेम,
हिंसा को करुणा,
क्रोध को आनंद ही तो
समेट सकता है...
जैसे सागर उछलती नदियों के आवेग को
समा लेता अपने भीतर
और शांत हो जाता
पर कभी अपनी हलचल से विवश
स्वयं ही मर्यादा तोड़ देता।

सागर के आवेग को समेटती धरती
विनाश की चादर में लिपटकर
ख़ुद के वज़ूद को बहाकर भी
अपनी गोद में शांत कर देती
सागर की बैचेन लहरों को।
कुछ वैसे ही जैसे
ये आसमान निगल लेता
धरती के सीने से निकलते धुएँ को,
और बदले में ठंढा करता
धरती के धधकते कलेजे को
बारिश की बूंदों से।

ठीक वैसे ही भावनाओं के ज्वार को
शब्द लगाम देते हैं...
विश्राम देते हैं...
और अपनी आग़ोश में थाम लेते हैं।

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

आसान नहीं भगवान बनना..

आसान नहीं भगवान बनना... 
भक्तों की उमड़ती भावनाओं के महासागर में जड़वत् रहना... 
नेत्रों से अविरल प्रेम और करुणा बरसाना... 
अधरों से अनवरत मधुर मुस्कान छलकाना... 
अश्रुओं से सिक्त होते चरण को अडिग रखना... 
भोग के पर्वतों के पार भूखे भक्तों की ललचाई आँखों का सामना करना....
चढ़ावे के बोझ से दबना...
पीत धातुओं की असहनीय चमक से अपनी आत्मा को बचाना..
पंचामृत से निरंतर गीली होती काया में मन का एक कोना सूखा रखना...
दीप के ताप में पिघलते पाप का गवाह बनना... 
धूप की सुगंध में विचारों की दुर्गन्ध का मेल होते देखना....
दान-पात्र में मुद्रा रूप में रखी इच्छाओं की लंबी सूची से जूझना...
अनन्त अपेक्षाओं के पर्वत शिखर पर विराजमान होकर नियति की मर्यादा से बँधना...
व्याकुल ह्रृदयों की पुकार में शांति की खोज करना 
...और इंसानों की भीड़ में भगवान बने रहना।

बुधवार, 8 नवंबर 2017

क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार..

कोटरों में धँसी उसकी आँखें
चिपकी हुई एक-दूसरे से आँतें
निराशाभरी उसकी बातें
झकझोर देती मुझे अंदर से
चीत्कार कर उठता मन उसके करुण-क्रंदन से
पूछता मन ये बार-बार
क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार?

पेट पीठ में जा धँसी
आँख कोटरों में जा धँसी
उसकी ये जर्जर हालत
रुला देती मुझे बार-बार
पूछता  मन ये बार-बार
क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार?

ज़िंदा लाश की तरह वो लगता
मन उसकी तरफ से न हटता
माँगता दया की भीख वो सबसे
द्वार पर खड़ा जाने कब से
पूछता मन ये बार-बार
क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार?

हम भोगें सुख-सुविधाएँ
क्या उसकी नहीं अभिलाषाएँ
क्या उसे जीने का अधिकार नहीं
क्या समाज को उसका अस्तित्व स्वीकार नहीं
पूछता मन ये बार-बार
क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार?

अब तो ये सारे देश की है कहानी
जग की है ये रीत पुरानी
कि ग़रीबी मर-मर के ज़िंदा है
और अमीरी एक आज़ाद परिंदा है
वो ज़िंदा लाश ग़रीबी ही तो थी
जिसे देखकर मन कह उठता बार-बार
क्या तुम्हें वाकई इससे नहीं कोई सरोकार?

जेल में बंद बूढ़ा शेर

ये कविता मैंने जुलाई, 1997 में लिखी थी जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के आरोप में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। घोटाले के आरोप में घिरे लालू प्रसाद यादव के खिलाफ गिरफ्तारी का वॉरंट निकल चुका था लेकिन जाते-जाते लालू प्रसाद ने सत्ता की कमान अपनी धर्मपत्नी राबड़ी देवी को सौंप कर बिहार की राजनीति में अपने दबदबे को बरकरार रखा था। 



जेल में बंद बूढ़ा शेर, बाहर पत्नी को बनाए अपनी ढाल,
थमीं नहीं पर बदली अवश्य उसकी गर्विल-सी चाल
चेतक-सा दौड़ा रणभूमि, पर आज मंद पड़ा सोच रहा, क्यों टूटी उसकी नाल
मौन नहीं,पर करता चिन्तन, बुन रहा मन-ही-मन, कूटनीति का विकट जाल
पढ़ता पत्रिकाएँ आनंदित होकर, सहलाता अपने श्वेत बाल,
लिखा है इनमें भी ,उसकी चतुराई भरी बुद्धि का कमाल
राजनीति के शतरंज में जीतता आया है वो, अकेला साल-दर-साल
मासूमियत से भरा उसका चेहरा और फूले हुए दो प्यारे गाल
उसे क्या मालूम, कब आई बाढ़ और कब पड़ा बिहार में अकाल
उसे तो था मतलब चारे से, चारे से होता रहा वह मालामाल
वह बजा रहा चैन की बंसी पर, सीबीआई ने बिगाड़ी सुर-लय और ताल
बनाया क़ैदी गेस्ट हाउस का, मुख्यमंत्री पद का भी न किया तनिक ख़्याल
दिल टूटा और हालत बिगड़ी, पहुँचे वह अस्पताल,
आज़ादी को तरसते मन को, बेस्वाद लगे कै़द की चावल-दाल
सबकी हुई जमानत, पर उनकी बारी आई तो मचने लगा बवाल
जेल के अंदर से चलाता शासन, बाहर पत्नी को बनाए राजपद का द्वारपाल।