गुरुवार, 24 नवंबर 2016

प्रकृति तो तेरी माता है...

(सितंबर,  2005 में भारतीय जनसंचार संस्थान में हुए काव्य पाठ में मैंने अपनी लिखी हुई ये कविता सुनाई थी। कविता काफी पुरानी सही लेकिन मेरे दिल के बेहद करीब है।  भाषा और विन्यास की कसौटी पर भले ही खरी न उतरती हो लेकिन संवदेनाओं के धरातल पर अपनी छाप जरुर छोड़ जाती है। इस कविता पाठ को सबने बहुत पसंद किया और निर्णायकों ने मुझे प्रथम पुरस्कार से सम्मानित भी किया।)

केले के पत्ते यूं खुलते,
संधि के पत्र ज्यों मुड़े हुए,
प्रकृति के तार,
मानव-हृदय के भावों से हैं जुड़े हुए।
प्रकृति ने भेजा है संदेश,
इन पत्तों के द्वारा,
मेरी ही गोद में हे मानव!
बीता जीवन तेरा सारा।
है आज-कल की बात नहीं,
सदियों का ये संबंध हमारा,
तू मेरी ही है एक कृति,
तू मुझको है सबसे प्यारा।

आदिकाल में पास मेरे,
तू नंगा-भूखा आया,
मैंने ही तुझको ममता से
गोद में अपनी सुलाया।
वस्त्र तेरे पत्ते और सिर पर
 घने वृक्षों का साया था,
कंद-मूल वृक्षों के खाकर,
तुमने वह समय बिताया था।

आग,कृषि का आविष्कार कर,
तूने स्वज्ञान बढ़ाया,
तू ऐसा डूबा आधुनिकता में
कि फिर पलट कर न आया।
हाथ में ले शक्ति विज्ञान की,
मुझपर अधिकार जताया,
रौब दिखाया किसको,
उसे, जिसने तुझे जीना सिखाया।

मेरी ही गर्भ में तुमने,
जीवन का वह अंकुर पाया,
पर बुद्धि-बल के अहंकार में,
मस्तिष्क तेरा भरमाया।
मेरी मृत-देह पर तुमने,
उन्नति का यह भवन बनाया,
हरे-भरे वन को उजाड़ कर,
तुमने है मुझे रुलाया,
दु:शासन-सा चरित्र तेरा,
कर नंगा मुझे, जश्न मनाया।

ऐसे ही अवसर पर मैंने,
पृथ्वी पर प्रलय मचाया था।
चली आंधी विनाश की ऐसी,
कि फिर कोई न बच पाया था।

दी ममता की छांव तुम्हें,
तो मौत भी दे सकती हूं।
कल तक तुम थे मित्रवत्,
तो आज शत्रु भी मान सकती हूं।
मत कर मेरा दोहन मानव,
वरना मैं फिर प्रलय मचा सकती हूं।
जिन अट्टालिकाओं का है गर्व तुम्हें,
चूर पल में उसे कर सकती हूं।

कोमल, शांत, मृदुल स्वभाव की,
मैं प्रलयंकारी भी बन सकती हूं।
छीनी तूने हरियाली मेरी,
मैं प्राण तेरे हर सकती हूं।
सागर की शांत लहरों में,
तूफान उठा मैं सकती हूं।
जिन वृक्षों से पायी छाया,
वंचित उनसे कर सकती हूं।

ये पर्वत जो हैं शांत खड़े,
उनमें हलचल पैदा कर सकती हूं।
जिस भूखंड पर तुम हो खड़े,
उसे भीतर समा सकती हूं।
तुम मेरी ही हो एक कृति,
तो तुम्हें मिटा भी सकती हूं।
पर तुम पुत्र मेरे, मैं प्रकृति माता,
ये भुला मैं कैसे सकती हूं..
जा तूझे सम्हलने का,
एक और अवसर मैं देती हूं।

इस कृत्रिम सुख से ऊबकर,
तू मेरी ही गोद में आता है।
फिर क्यों कंकरीट के ये ऊंचे,
नित नये जंगल बनाता है।
हर सुख भोगा, पर मन तेरा
क्यों शांत नहीं हो पाता है।
जब जी चाहे, तुम आ जाना,
मत भूल कि ये प्रकृति तो तेरी माता है।


मीडिया और आम आदमी..

(नोट- जनवरी, 2005 में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान लिखी हुई एक रचना जिसके लिए सराहना भी मिली और पुरस्कार भी। वैसे तो इसमें लिखी हुई कई बातें अब पुरानी हो चुकी हैं लेकिन इसका मूल भाव अब भी प्रासांगिक है और इसीलिए इसे आप सबके साथ सांझा कर रही हूं।)


बात अगर बीते साल के नायक की हो तो महानायक अमिताभ नहीं बल्कि आर.के लक्ष्मण का 'आम आदमी' है। बदलते हुए सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में हाशिए पर धकेला जाता आम आदमी ख़ास बनता जा रहा है। विज्ञापन जगत के नए चेहरे के रुप में उभरे इस 'आम आदमी' ने मीडिया गुरुओं को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। बात चाहे छोटे पर्दे की हो, बड़े पर्दे की हो या फिर अख़बारों की, हर जगर आम आदमी ही छाया हुआ है। आम आदमी की आम से ख़ास बनने की बेहद आम चाहत को मीडिया ने जमकर भुनाया और सफलता पायी।

सास-बहू सीरिज के धारावाहिकों के डिज़ायनर और फैशनेबल चेहरों के बीच एक अति साधारण-सी शक्ल-सूरत वाली 'जस्सी' की सफलता इसी बात का प्रमाण है। एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की महत्वाकांक्षी लड़की जो फैशन की चमकती-दमकती दुनिया में अपनी सशक्त पहचान बनाने में कामयाब होती है। इंडियन आइडल  का अभिजीत सावंत करोड़ों भारतीयों के सपनों को प्रतिबिंबित करता है। नाम-दौलत और शोहरत, इस तिकड़ी को पाने की चाहत में वह कुछ भी कर गुज़रने को तैयार है। फिल्म 'बंटी और बबली' की सफलता के मूलत: यही भावना काम कर रही थी जो दर्शकों को जोड़ने में कामयाब रही और पचास करोड़ की कमाई कर गई।

बाज़ार का मिजाज़ तेज़ी से बदल रहा है। आम आदमी के रुप में परम्परागत विशिष्ट वर्ग से इतर एक व्यापक संभावनाशील उपभोक्ता वर्ग का उदय हो रहा है। बाज़ार के संचालक अब अपनी नीतियों का निर्धारण इसी आम आदमी को केंद्र में रखकर कर रहे हैं। राष्ट्रीय मीडिया का स्थानीयकरण हो रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय घटनाक्रम के बीच प्रादेशिक ख़बरें अपनी जगह बना रही हैं क्योंकि उन्हें देखने, सुनने और पढ़ने वालों की तादात ज़्यादा है।

अपराध की ख़बरें भी चैनलों की टीआरपी बढ़ा रही है क्योंकि इनमें आम आदमी की दिलचस्पी है। इसी आम आदमी की सिर उठाकर जीने की चाहत को कोका कोला ने अपने विज्ञापन का कैचलाइन बना दिया है। राजनीतिक दल भी इस आम आदमी की माया से चकित होते रहे। कभी लालू को अपना सिरमौर मानने वाली बिहार की आम जनता ने इस बार नीतिश बाबू पर अपना प्यार उड़ेल दिया। दरअसल अब आम आदमी को अपनी महत्ता का अहसास होने लगा है। उसे मालूम हो चुका है कि उसके आम होने की वजर से ही ये ख़ास लोग ख़ास बने हुए हैं।



बुधवार, 23 नवंबर 2016

अजी सुनती हो...नारीवाद के बोझ तले दबे एक बेचारे की पुकार


                 (व्यंग्य)

तीसरी कसम का गाना, "दुनिया बनाने वाले..क्या तेरे दिल में समायी.." जब भी सुनता हूं तो बरबस एक आह-सी निकलती है। काश! इस गाने के बोल कुछ ऐसे होते, "दुनिया बनाने वाले ...क्या तेरे मन में समायी...तूने काहे को लड़की बनाई.."। हो गए न नारीवादियों के कान खड़े। डर है कि कहीं उनकी ऊंची एंड़ी वाली नुकीली चरणपादुकाएं समानान्तर से लंबवत् न हो गई हों, वरना अपनी तो ख़ैर नहीं। सारे ज़माने से छिपते-छिपाते इस कॉलम की शरण में आया हूं। कहने को तो हम वाक्-अभिव्यक्ति की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन, असलियत तो ये है कि इस मोर्चे पर आकर हमारी तो बोलती ही बंद हो जाती है। समाज में कहने भर को  हमारी सत्ता है लेकिन असलियत में हम सताए हुए हैं।

मन रे...तू काहे न धीर धरे.....आज कलेजा फटने को है और इसकी आह पूरी दुनिया को सुनाई पड़ने वाली है। अगर मार्क्स आज के दौर में होते तो यही नारा लगाते कि, "दुनियाभर के मर्दों एक हों..."। संसार का वर्गीय चरित्र आज भी कायम  है। दो वर्ग हैं, एक जो इठलाती हैं, मुस्कुराती हैं और मिनटों में आँखों के पर्दे पर छा जाती हैं। दूसरा वह है जो संकुचाता है, मन मसोस कर खींसें निपोरता है और अपने ही हाथों से सिर पर बचे-खुचे बालों को नोंचता है। एक, जिसने सफलता के निशाने पर ख़ूबसूरती का तीर मारा और दूसरा, बेचारा...नारीवाद का मारा। 

अब देख लीजिए, हमारा मुंह खुलता नहीं कि कमान की तरह संवरी हुईं उनकी भवें तन जाती हैं और फिर दनादन वाक्-बाणों का प्रहार होने लगता है। पोथी-पुराण की तरह स्त्री-शोषण के हमारे इतिहास को बांच-बांचकर हमें हर पल अपराधी होने का अहसास कराया जाता है। अजी सुनते हो! कहकर अनवरत सुनाने वाली..मेरी पुकार भी जरा सुन लो। आख़िर हम कब तक अपने पुरखों के बुरे कर्मों का फल भोगते रहेंगे। सारी भड़ास हम पर ही निकालोगी या कुछ हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए भी बचाकर  
रखोगी। हम तो पहले से ही सताए हुए हैं, अब और न सताओ। 

मेरा प्रस्ताव है कि महिला दिवस की जगह 'विश्व पुरुष दिवस' का आयोजन करना चाहिए। साल में एक दिन तो हमें भी अपनी बात कहने का मौका मिले। इस मांग को अंतर्राष्ट्रीय पीड़ित पुरुष संगठन के वैश्विक मंच पर आगामी वर्ष में ८ मार्च को रखा जाना है। आखिर हमें भी बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। आसपास नज़रें दौड़ाता हूं तो अपने कार्यक्षेत्र में महिलाएं-ही-महिलाएं नज़र आती हैं। कहते हैं कि सावन के अंधे को हर तरफ हरा-ही-हरा नज़र आता है लेकिन यहां तो सिग्नल ग्रीन नहीं बल्कि रेड है। समझो अब तुम्हारी कुर्सी भी खतरे में है। 

इंद्र की तरह मुझे भी अपना बिन राजपाट वाला सिंहासन डोलता नज़र आ रहा है। ऊपरवाले की तरफ देखता हूं तो वहां भी देव से ज्यादा देवियों को रिजर्वेशन मिला हुआ है। 'जाउं कहां बता ए दिल...दुनिया बड़ी है संगदिल...', शायद हमारी पीड़ा खूबसूरत मोहतरमाओं के दिल को सुकून पहुंचा रही होगी। बड़ी कातिल अदा से वे अपनी रेशमी ज़ुल्फों में ऊंगलियां धुमा रही होंगी और मन-ही-मन ख़ुशी के गीत गुनगुना रही होंगी। बस अब अपनी व्यथा-कथा को यहीं समाप्त करता हूं, क्योंकि "रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय, सुनि अठिलैह लोग सब, बाटि न लैहें कोय"।



मैं और मेरी तन्हाई...

कुछ दीवारों के सहारे रेंग रही है जिंदगी...ये दीवारें घर की है, दफ्तर की है या फिर किसी स्टूडियो की। एक अजनबीपन इन दीवारों के पार से झांक रहा है मेरे भीतर और कर रहा है परेशान। कुछ धुटता हुआ महसूस कर रही हूं। लगता है बस अभी छलक पड़ेंगी आंखें मेरी। कितनी बेबस है मेरी बेबसी इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा पाई हूं मैं। लेकिन लगता है कि ये भी बस यूं ही है क्योंकि मैं खुद इसे ढोती जा रही हूं। बिना साहस किए सबकुछ बदल जाने की जाने किस कोरी कल्पना में जिए जा रही हूं। मानो किसी चमत्कार की उम्मीद है लेकिन अब इसमें भी किसी ने लगा दी है सेंध। कभी-कभी लगता है सबकुछ एक झटके में खत्म कर दूं...अपने अंदर का आक्रोश, ये बेगानापन, ये मजबूरी, लेकिन न जाने किस बंदिश से खुद को बेबस पाती हूं। आने वाला कल कहीं और स्याह न हो इसी डर से अंधेरे में गुजर रहा है मेरा आज। कहने को तो बहुत कुछ है लेकिन जज़्ब हो जाता है दिल के अंदर जैसे कोई गहरा राज़। क्यों खुश नहीं हूं मैं जबकि पहले से कितनी अलग है ये ज़िंदगी..यहां तंगी नहीं पैसों की और न ही जिंदगी में कोई बुराई है बस नज़रिए का फर्क़ है बदल लो तो सबकुछ बदल जाएगा। दर्द जो सीने में रह-रहकर चुभता है खुशी बनकर आंखों में बस जाएगा। शायद मैंने ही अपनी खिड़कियों को कुछ इस क़दर बंद कर रखा है कि बाहर की ताज़ी हवा इधर का रुख़ नहीं करती और फिर दम धुटने का बहाना बनाकर लेट जाती हूं चुपचाप बंद कमरे में अकेली अपनी तन्हाई को कोसती। बस मन की गांठों को खोलने भर की है देरी फिर जीना कितना आसान हो जाएगा। सबको अपनाने की है देरी फिर यहां रहना कितना आसान हो जाएगा। या मन को समझा लो या ख़ुद को समझ लो, सबको समझने में जिंदगी का तार ही छूट जाएगा। फिर न कहना कि तुम्हें किसी ने चेताया नहीं वरना यहां रहना और भी मुश्किल हो जाएगा। अब बचपने की बात ना करना तुम जिंदगी बुढ़ापे को ओर जाती नज़र आती है। खुद को समझने-समझाने में यहां लोगों की आधी उम्र गुज़र जाती है। खुश करना और खुश रहना दो अलग बातें हैं,इन्हें एक करने की गुस्ताख़ी ना करो। या तो ख़ुद ख़ुश हो लो या किसी को ख़ुश रखो ज़िंदगी समझौतों का एक नाम है लेकिन समझौतों के साथ ज़िंदगी जी नहीं जाती,ढोयी जाती है।

ज्ञान मत बांटों..

ज्ञान मत बांटों क्योंकि ज्ञान बिकाऊ नहीं है,
 और हमने भी कोई ज्ञान की धर्मशाला नहीं खोली है। 

हम यहां बैठकर अपनी दुकान चलाते हैं और
 तुम हो कि धंधे को मंदा करने चले हो। 

इतना ही शौक़ है ज्ञान बांटने का तो
 मोमबत्ती की रोशनी में 
उकरेते रहो काग़ज़ों के बंडलों में अपना ज्ञान। 

 यहां क्यों चले आए
 हमने तो नहीं बुलाया था तुम्हें
 ख़ुद की गरज थी तुम्हारी। 
भौतिक ताप की आंच से
 पिघलने लगा था तुम्हारे उसूलों का फ़ौलाद। 
तो अब हमारी नींव क्यों हिलाने आए हो। 

 देखते नहीं ये बाज़ार है बाज़ार, 
पल भर भी जो हमसे रुठ गया हमारा खरीददार 
तो सरेआम हमारा दिवाला निकल जाएगा 
और तुम्हारा ज्ञान, 
स्क्रीप्ट के एक पन्ने तक ही सिमट कर रह जाएगा। 

 कोई इस मूर्ख को समझाओ 
कि ज़माना बदल रहा है 
क्रांति और बदलाव की बात न करें। 
ये पुरानी बीमारियां थी 
जिनसे बड़ी मुश्किल से निजात पाई है हमने।

 अब हम चमचमाती दुनिया के बाशिंदें हैं।
 उस बिजबिजाती बदबूदार दुनिया की याद मत दिलाओ हमें 
वो सिर्फ एक कहानी है,
एक रात के स्लॉट भर की
 जिसे दिखाकर हम बेचते हैं 
कई सपने और कई संवेदनाएं। 

 ऐ खादी को आत्मसम्मान से जोड़ने वालों,
अब ये फैशन की चीज़ बन चुकी है। 
किसी के ग़म में शरीक होना
 इंसानियत का तकाज़ा नहीं 
ये तो अब हमारी रोज़ की आदत सी बन चुकी है।

 रो लो तुम भी जीभर के, 
कि आज के बाद तुम्हारा ये ज्ञान भी, 
अज्ञानता के अंधेरे में खोने वाला है। 
चाय की गर्म चुस्कियों में तुम ठंडी आहें भर लेना
 बहुत जल्द स्क्रीन पर एक ब्रेकिंग न्यूज आने वाला है।

हमने टीआरपी का महल है सजाया

मनोरंजन है और मसाला भी,
चलो बहुत बढ़िया है।

 ख़बर भी है और गर्मागर्म भी,
 चलो बहुत बढ़िया है।

 सनसनी भी है और ख़ौफ भी,
चलो बहुत बढ़िया है।

 नाच भी है और ड्रामा भी,
 चलो बहुत बढ़िया है। 

दर्द भी है और वो भी बिकाऊ,
 ये सबसे बढ़िया है,
कि अब बिक जाएगा
 जो माल किया है तैयार हमने।

 बाज़ार बड़ा है
और कॉम्पीटीशन तगड़ा
 सामने वालों ने भी अच्छा पकाया है मसाला,
 लेकिन हमने भी ख़बर में कम तड़के नहीं लगाए।

 उन्होंने खर्च किए हैं हज़ारों-लाखों,
खर्च हमने भी खूब की है अपनी अक्ल।
 दिमाग अपना और माल पराया,
  ऐसे ही तो हमने टीआरपी का महल है सजाया।

एक कविता...

लिखने आई हूं मैं एक कविता,
 लेकिन अब लगता है मानो मैं वो कविता ही भूल गई हूं।

 शब्द हैं कि अब यूं ही याद नहीं आते,
 मानो वो भी किसी ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह अचानक से कौंधने लगे हैं,
 या फिर स्क्रीन पर न्यूज फ्लैश की पट्टियों की तरह ज़ेहन में चमकने लगे हैं।

 अभी कहां,अभी तो प्लॉट ही सोचा है,
पूरी कहानी तो बाकी है इसीलिए,
शब्द भी ईंट की तरह भट्टियों से गर्मागर्म ही निकलेंगे..
और उनका मसाला भी तो तैयार होना चाहिए।

 इतनी जल्दी भी क्या है,
 अभी तो एक ड्रामा चल ही रहा है लेकिन,
दूसरे की दरकार फिर भी बाकी है।

 चलो-चलो अब दूसरा मंच भी जल्द ही तैयार कर लो
 क्योंकि पहला नाटक अब खत्म होने ही वाला है।
 ब्रेक में ये मजमा उठकर बगल के चैनल पर न जम जाए,
इसकी फ़िक्र में देख नहीं रहे,
 कितनी जल्दी चढ़ा ली है अपने बालों पर सफेदी
 कि बढ़ती तनख़्वाह के साथ बढ़ी हैं मेरी परेशानी भी,
 ये शिकन मेरी पेशानी पर यूं ही नहीं आते।

 इस हफ्ते की टीआरपी ने उड़ाई है बहुतों की नींदें,
 अब तो रात में भी इसका भूत मेरा पीछा नहीं छोड़ते।
 हर रिंगटोन पर धड़क उठता है मेरा दिल
ये सोचकर कि जाने अब किसकी शामत आई है।