बुधवार, 8 नवंबर 2017

क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार..

कोटरों में धँसी उसकी आँखें
चिपकी हुई एक-दूसरे से आँतें
निराशाभरी उसकी बातें
झकझोर देती मुझे अंदर से
चीत्कार कर उठता मन उसके करुण-क्रंदन से
पूछता मन ये बार-बार
क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार?

पेट पीठ में जा धँसी
आँख कोटरों में जा धँसी
उसकी ये जर्जर हालत
रुला देती मुझे बार-बार
पूछता  मन ये बार-बार
क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार?

ज़िंदा लाश की तरह वो लगता
मन उसकी तरफ से न हटता
माँगता दया की भीख वो सबसे
द्वार पर खड़ा जाने कब से
पूछता मन ये बार-बार
क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार?

हम भोगें सुख-सुविधाएँ
क्या उसकी नहीं अभिलाषाएँ
क्या उसे जीने का अधिकार नहीं
क्या समाज को उसका अस्तित्व स्वीकार नहीं
पूछता मन ये बार-बार
क्या तुम्हें नहीं इससे सरोकार?

अब तो ये सारे देश की है कहानी
जग की है ये रीत पुरानी
कि ग़रीबी मर-मर के ज़िंदा है
और अमीरी एक आज़ाद परिंदा है
वो ज़िंदा लाश ग़रीबी ही तो थी
जिसे देखकर मन कह उठता बार-बार
क्या तुम्हें वाकई इससे नहीं कोई सरोकार?

जेल में बंद बूढ़ा शेर

ये कविता मैंने जुलाई, 1997 में लिखी थी जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के आरोप में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। घोटाले के आरोप में घिरे लालू प्रसाद यादव के खिलाफ गिरफ्तारी का वॉरंट निकल चुका था लेकिन जाते-जाते लालू प्रसाद ने सत्ता की कमान अपनी धर्मपत्नी राबड़ी देवी को सौंप कर बिहार की राजनीति में अपने दबदबे को बरकरार रखा था। 



जेल में बंद बूढ़ा शेर, बाहर पत्नी को बनाए अपनी ढाल,
थमीं नहीं पर बदली अवश्य उसकी गर्विल-सी चाल
चेतक-सा दौड़ा रणभूमि, पर आज मंद पड़ा सोच रहा, क्यों टूटी उसकी नाल
मौन नहीं,पर करता चिन्तन, बुन रहा मन-ही-मन, कूटनीति का विकट जाल
पढ़ता पत्रिकाएँ आनंदित होकर, सहलाता अपने श्वेत बाल,
लिखा है इनमें भी ,उसकी चतुराई भरी बुद्धि का कमाल
राजनीति के शतरंज में जीतता आया है वो, अकेला साल-दर-साल
मासूमियत से भरा उसका चेहरा और फूले हुए दो प्यारे गाल
उसे क्या मालूम, कब आई बाढ़ और कब पड़ा बिहार में अकाल
उसे तो था मतलब चारे से, चारे से होता रहा वह मालामाल
वह बजा रहा चैन की बंसी पर, सीबीआई ने बिगाड़ी सुर-लय और ताल
बनाया क़ैदी गेस्ट हाउस का, मुख्यमंत्री पद का भी न किया तनिक ख़्याल
दिल टूटा और हालत बिगड़ी, पहुँचे वह अस्पताल,
आज़ादी को तरसते मन को, बेस्वाद लगे कै़द की चावल-दाल
सबकी हुई जमानत, पर उनकी बारी आई तो मचने लगा बवाल
जेल के अंदर से चलाता शासन, बाहर पत्नी को बनाए राजपद का द्वारपाल।



मंगलवार, 7 नवंबर 2017

परिवर्तन काल

फटने को है ज़मीन, कि आसमान हुआ लाल
सुलग रहा ज्वालामुखी, आ रहा लावा में उबाल
विवश हो सिसकती ज़िंदगी, है उसे अपने ज़िंदा होने का मलाल
सूखती नदियाँ, भूमि बंजर, चारों ओर फैल रहा अकाल
सूख गई लताएँ, बुन लिए मकड़ियों ने अपने जाल,
उलझ गई संध्या-सुंदरी के सुंदर रेशमी बाल
टूटते हिमखंड, सरकती शिलाएं, झुक गया हिमालय का उन्नत भाल
बदल गई कोसी की अल्हड़-सी मतवाली चाल
उफनता सागर, उछलती लहरें, उड़ रहा डोलती नैया का पाल
पहन लिए हैं भेड़ियों ने भेड़ों की नर्म उजली खाल
गले में पहने कंठी, रक्त-मांस से भरे उनके गाल
लुट रही जनता, हो रहे नेता मालामाल
सत्य मौन, पर झूठ का मच रहा चारों ओर बवाल
बदलती सरकारों का है मौसम, मौसम का हुआ बुरा हाल
नवांगतुकों का है युग, कि उतार फेंके हैं बूढ़े वृक्षों ने अपनी छाल
आँकड़ों में जी रहा नव-भारत, आँकड़े बदलते हर साल
डोर पकड़े राजनेता और जनता नाचती उनकी धुन पर साथ लिए सुर-ताल
सम्मान का खेल हुआ सस्ता, एक उपाधि, एक चेक और सफेद रंग की एक शाल
ईमानदारी की खुदती क़ब्र, फलते-फूलते हर्षद से कई दलाल
टूटती वर्जनाएँ, परम्पराओं का न रहा तनिक ख्याल
फास्ट फूड के युग में बेस्वाद हो रही घर की चावल-दाल
अलगाव की आग में जलता भारत, चाहे मुंबई हो या इंफाल
देखते होकर मौन हम वक्त की सूइयों का कमाल
संकेत नहीं, है ये चेतावनी कि आ चुका है परिवर्तन-काल


क़िस्मत

ज़िंदगी के किसी मोड़ पर जब दे जाती है दग़ा क़िस्मत,
और हम उसे कोसने लगते हैं, पाकर अपनी इच्छा अधूरी...
कोई राह नहीं सूझता है तब,
जब जीवन की मरुभूमि में यूं ही भटकने छोड़ देती है क़िस्मत...
बिना किसी सहारे के, यूं नाउम्मीदी के साए में...
तिल-तिल कर मरती रहती है ज़िंदगी,
और दूर खड़ी क़िस्मत मुस्कुराती रहती है हम पर
अट्टहास कर याद दिलाती है, उस चुभते अहसास का
जिससे बचकर हम दूर भागना चाहते हैं...
पर रेत के ढेर से फिसलकर, फिर वहीं आ खड़े होते हैं...
रेत की आँधियाँ देर तक घेरे रहती हैं हमें
और हम छटपटाते रहते हैं इनसे निजात पाने को...
पर यह सब देख रही हमारी क़िस्मत,
दूर कहीं खड़ी होकर हम पर हंस रही होती है।


ख़ामोश चीत्कार

मेरे अंत:करण में अक्सर एक भूचाल-सा उठता है...
मेरा स्व-विरोध, मेरी आत्मा को पल-पल झंझोरता है।

कुछ अतृप्त इच्छाएँ, अभिलाषाएँ और कल्पना की एक ऊँची उड़ान...
पर हाथ आती है बस बेबसी, निराशा और एक दीर्धकालिक थकान।

भविष्य का सुनहरा स्वप्न और वर्तमान का कठोर यथार्थ..
अभाव का कड़वा सच और दम तोड़ता पुरुषार्थ।

उन परम्पराओं का करती विरोध, जिनसे जुड़े आत्मा के तार..
पैरों की बेड़ियों से लगते ये पारिवारिक संस्कार।

दोहरे मापदंड, दोहरी ज़िंदगी और आधे से कम होती मेरी आत्मा का आकार...
इन सब में पिसती मैं और मेरी आत्मा की घुटती ख़ामोश चीत्कार





रिमझिम बरस रहा सावन है...

गगन की विशाल जलराशि का, धरा पर आगमन है;
बरसने का बादल को, धरणि ने निमंत्रण है।
सूर्य की किरणों से तप्त धरा का, भींग रहा कण-कण है;
अनगिनत भावों को जगाता, रिमझिम बरस रहा सावन है

गगन के मोतियों को, अपने आँचल में, भर रही धरा;
धरणि की गोद में, अनमोल कणों का अक्षय भंडार है भरा।
वर्षा के जल से नहाए वृक्षों से, लग रहा आँगन हरा-भरा;
विशाल बाहों को नीले अंबर की ओर फैलाए, वह एकांकी बरगद सुदूर में है खड़ा।

जलकणों ने धो डाली, पत्तों पर जमी धूल;
खिल रहे उपवन में मेरे नित नए मनोरम फूल।
सावन के झूले पर राधा, गोपियों संग रही है झूल;
आओ मिलकर आनंद उठाएं इसका, जाएं हम सभी दुखों को भूल।

पीताम्बरी पहने पत्तों की, हो चुकी है विदाई;
नूतन किसलय खिले, तरुओं पर है बहार छाई।
सुषुप्त बीजों के फूटे अंकुर, खेतों में है हरियाली छाई;
वर्षा की अमृतमय बूँदें, नवजीवन का है संदेश लाई।

नवजीवन के संग-संग, आ रहा दबे पाँव काल;
सूखी नदियों ने, रुप धर लिया है विकराल।
फैला रही हैं ये नदियाँ, सर्वत्र अपनी माया का जाल;
बाढ़ की आशंका ने उठाएं हैं कई अहम सवाल...

जल ने कहीं किया नवनिर्माण, तो कहीं फैलाया विध्वंस;
कहीं रुप धरा कृष्ण का, तो कहीं बन गया कंस।
कहीं बूँद को भी तरस रहे लोग, कहीं बाढ़ का मना रहे शोक;
डूबती-उबरती जलधारा में कुछ रहे गए इहलोक, तो कुछ चले गए परलोक।







बुधवार, 30 अगस्त 2017

मैं और मेरी तन्हाई

कुछ दीवारों के सहारे, ज़िंदगी रेंग रही है...ये दीवारें घर की हैं..दफ़्तर की हैं...या फिर किसी स्टूडियो की...।
एक अजनबीपन इन दीवारों के पार से झांक रहा है। मुझे अंदर से कर रहा है परेशान। कुछ घुटता हुआ महसूस कर रही हूं। लगता  है बस अभी छलक पड़ेंगी आंखें मेरी। मेरी बेबसी कितनी बेबस है इसका अंदाज़ा नहीं लगा पायी हूं मैं। लेकिन, लगता है कि ये भी बस यूं ही है क्योंकि मैं ख़ुद ही इसे बेबसी के जंज़ीर में जकड़ें ढोती चली जा रही हूं। बिना किसी साहस के सबकुछ बदल जाने की किस कोरी कल्पना के सहारे जी रही हूं। मानो, किसी चमत्कार की उम्मीद है...लेकिन, अब इस उम्मीद में भी सेंध लगा दी है किसी ने। कभी-कभी लगता है कि सबकुछ एक झटके में ख़त्म कर दूं....अपने अंदर का आक्रोश..ये बेग़ानापन और ये मजबूरी....लेकिन न जाने किस मजबूरी से ख़ुद को घिरा पाती हूं। इस अकेलेपन की वजह भी तो ख़ुद मैं ही हूं। आने वाला कल कहीं और भी स्याह न हो जाए...इसी डर से अंधेरे में गुज़र रहा है अपना आज। कहने तो को तो बहुत कुछ है..लेकिन जज़्ब हो जाता है दिल के अंदर जैसे हो कोई गहरा राज़। क्यों ख़ुश नहीं हूं मैं...जबकि पहले से कितनी अलग है ये ज़िंदगी....यहां पैसों को लेकर उतनी लड़ाई नही है...और न ही यहां की ज़िंदगी में कोई बुराई है...बस फ़र्क़ है तो नज़रिए का। एक बार बदल लो तो, सबकुछ बदल जाएगा...दर्द जो सीने में रह-रहकर चुभता है...ख़ुशी बनकर आंखों में समा जाएगा। शायद मैंने ही अपने दिल की खिड़कियों को कुछ इस क़दर बंद कर रखा है कि बाहर की ताज़ी हवा अंदर न आने पाए और फिर दम घुटने का बहाना बना कर लेटी रहती हूं चुपचाप बंद कमरे में अकेली..कोसती अपनी तन्हाई को। बस मन की गांठों को खोलने भर की देर है फिर जीना कितना आसान हो जाएगा। सबको अपनाने की है देरी, फिर यहां रहना कितना आसान हो जाएगा। या मन को समझा लो या ख़ुद को समझ लो...सबको समझने में ही ज़िंदगी का तार छूट जाएगा। फिर न कहना कि तुम्हें किसी ने चेताया न था..वरना यहां रहना और भी मुश्किल हो जाएगा। अब बचपने की बात न करो। ज़िंदगी बुढ़ापे की ओर जाती नज़र आती है। ख़ुश करना और ख़ुश रहना..दो अलग-अलग बातें हैं, इन्हें एक करने की ग़ुस्ताख़ी न करो। या तो ख़ुद ख़ुश हो लो या फिर किसी और को ख़ुश कर लो। ज़िंदगी समझौतों का नाम है, लेकिन समझौतों के साथ ज़िंदगी जी नहीं जाती.... ढोयी जाती है।