बुधवार, 30 अगस्त 2017

मैं और मेरी तन्हाई

कुछ दीवारों के सहारे, ज़िंदगी रेंग रही है...ये दीवारें घर की हैं..दफ़्तर की हैं...या फिर किसी स्टूडियो की...।
एक अजनबीपन इन दीवारों के पार से झांक रहा है। मुझे अंदर से कर रहा है परेशान। कुछ घुटता हुआ महसूस कर रही हूं। लगता  है बस अभी छलक पड़ेंगी आंखें मेरी। मेरी बेबसी कितनी बेबस है इसका अंदाज़ा नहीं लगा पायी हूं मैं। लेकिन, लगता है कि ये भी बस यूं ही है क्योंकि मैं ख़ुद ही इसे बेबसी के जंज़ीर में जकड़ें ढोती चली जा रही हूं। बिना किसी साहस के सबकुछ बदल जाने की किस कोरी कल्पना के सहारे जी रही हूं। मानो, किसी चमत्कार की उम्मीद है...लेकिन, अब इस उम्मीद में भी सेंध लगा दी है किसी ने। कभी-कभी लगता है कि सबकुछ एक झटके में ख़त्म कर दूं....अपने अंदर का आक्रोश..ये बेग़ानापन और ये मजबूरी....लेकिन न जाने किस मजबूरी से ख़ुद को घिरा पाती हूं। इस अकेलेपन की वजह भी तो ख़ुद मैं ही हूं। आने वाला कल कहीं और भी स्याह न हो जाए...इसी डर से अंधेरे में गुज़र रहा है अपना आज। कहने तो को तो बहुत कुछ है..लेकिन जज़्ब हो जाता है दिल के अंदर जैसे हो कोई गहरा राज़। क्यों ख़ुश नहीं हूं मैं...जबकि पहले से कितनी अलग है ये ज़िंदगी....यहां पैसों को लेकर उतनी लड़ाई नही है...और न ही यहां की ज़िंदगी में कोई बुराई है...बस फ़र्क़ है तो नज़रिए का। एक बार बदल लो तो, सबकुछ बदल जाएगा...दर्द जो सीने में रह-रहकर चुभता है...ख़ुशी बनकर आंखों में समा जाएगा। शायद मैंने ही अपने दिल की खिड़कियों को कुछ इस क़दर बंद कर रखा है कि बाहर की ताज़ी हवा अंदर न आने पाए और फिर दम घुटने का बहाना बना कर लेटी रहती हूं चुपचाप बंद कमरे में अकेली..कोसती अपनी तन्हाई को। बस मन की गांठों को खोलने भर की देर है फिर जीना कितना आसान हो जाएगा। सबको अपनाने की है देरी, फिर यहां रहना कितना आसान हो जाएगा। या मन को समझा लो या ख़ुद को समझ लो...सबको समझने में ही ज़िंदगी का तार छूट जाएगा। फिर न कहना कि तुम्हें किसी ने चेताया न था..वरना यहां रहना और भी मुश्किल हो जाएगा। अब बचपने की बात न करो। ज़िंदगी बुढ़ापे की ओर जाती नज़र आती है। ख़ुश करना और ख़ुश रहना..दो अलग-अलग बातें हैं, इन्हें एक करने की ग़ुस्ताख़ी न करो। या तो ख़ुद ख़ुश हो लो या फिर किसी और को ख़ुश कर लो। ज़िंदगी समझौतों का नाम है, लेकिन समझौतों के साथ ज़िंदगी जी नहीं जाती.... ढोयी जाती है। 

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

मेरे जीवन का लक्ष्य...

मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, आत्मसंतुष्टि। मेरी आत्मा संतुष्ट रहे। उस पर कोई बोझ न हो। किसी प्रकार की ग्लानि का भाव न हो। मानव होने के नाते, मैं जितने तरह के कर्तव्यों का पालन कर सकती हूं, करूं। अपने विभिन्न कर्तव्यों के बीच आवश्यक सामञ्जस्य स्थापित कर सकूं, ऐसी कामना है। कामना है कि हर आंख में सुखद जीवन का स्वप्न पलें।

मेरी इच्छा है कि मैं हर चेहरे पर आशा और विश्वास की आभा देख सकूं। मेरे दोनों हाथ मानव-मात्र की बहुतरे सेवा में संलग्न हों। मेरी बुद्धि उनके जीवन-उत्थान के अभियान में संलग्न हों। मैं अपनी उत्पत्ति के औचित्य को सिद्ध कर सकूं। एक बैचेनी, एक विद्रोह का स्वर जो मेरी आत्मा में उपजता है इस अव्यवस्था के खिलाफ, उसकी निकासी का मार्ग प्रशस्त कर, अपनी आत्मा को  शांति प्रदान कर सकूं।

मैं ग़रीबों के साथ ग़रीबी हटाओ का खोखला नारा लगाती नज़र नहीं आना चाहती। मैं चाहती हूं कि मेरा स्वर उनकी हंसी बनकर खिलखिलाएं। मैं सामर्थ्यवान बन सकूं ताकि उन्हें भी सामर्थ्य प्रदान करने में अपना सार्थक योगदान दे सकूं। मैं स्वयं तपती रहूं और उन्हें भी तपती देखूं, इतनी महान और अकर्मण्य नहीं हूं मैं। मेरी कामना है कि मैं अपने सामर्थ्य से छाता खरीद सकूं, जिसके साए में मैं स्वयं भी खड़ी रहूं और दूसरों को भी छाया दे सकूं। मुझे अपने ये दोनों हाथ किसी के आगे फैलाने न पड़े और न ही मैं अपने आगे किसी और के हाथ पसरे हुए देखूं। उन पसरे हाथों पर दया के भीख के टुकड़ों की जगह, मैं उन्हें वह हुनर दे सकूं जो उन्हें स्वावलंबी बनाएं।

रौशनी के लिए किसी-न-किसी को तो जलना ही पड़ता है। बग़ैर जले अंधकारमय होकर भला किसने रौशनी फैलायी है। लेकिन अगर वह रौशनी कांच के सुंदर रौशनदानों में क़ैद हो जाए तो भला वह किस काम की ? मेरी इच्छा है कि मैं अपने जीवन में पहले एक मुकाम हासिल कर सकूं ताकि दूसरों को भी उनकी मंज़िल तक पहुंचाने में उनकी मददगार बन सकूं। लेकिन, मेरा मुकाम इतना ऊंचा भी न हो कि जहां से मैं किसी और का हाथ न पकड़ सकूं। मेरी सफलता की रौशनी कांच के रौशनदानों में क़ैद न हो जाए, बल्कि किसी ग़रीब के घर की लालटेन जला सके, ऐसी मेरी इच्छा है।

मैं जानती हूं कि मेरी इच्छा दुरुह है। एक ऐसी संकरी गली जिससे होकर गुजरना बहुत मुश्किल काम है। एक तरफ महल-दो महलें हैं और दूसरी तरफ झुग्गी-झोपड़ियां। दलदल तो दोनों ही तरफ है...एक तरफ विलासिता का और दूसरी तरफ अभाव का। मुझे इन दोनों से ही बचना है। सुख और दुख, दोनों ही जीवन के दो पहलू हैं। सिर्फ़ दुख की कामना करूं, मेरा हृदय इतना विशाल नहीं और मात्र सुख की कपोल-कल्पना में रहूं, यह भी संभव नहीं है। अतएव, मेरी इच्छा है कि सुख इतना मिले कि दुख को झेलने का अभ्यास बना रहे और दुख इतना मिले कि सुख के आगमन की आशा जीवित रह सके।

मैं एक साधारण मनुष्य हूं लेकिन मेरी इच्छाएँ साधारण नहीं हैं। मैं ज़िंदगी को न सिर्फ़ जीना चाहती हूं, बल्कि उसे जीते हुए देखना भी चाहती हूं। मैं एक आम इंसान की मौत नहीं मरना चाहती। मैं चाहती हूं कि मेरा हर काम इंसानी शक्लों पर हंसी के तरन्नुम बिखेरता रहे। मैं अमर हो जाऊं इस हवा में, उनकी ख़ुशी का गीत बनकर। हां, मैं स्वार्थी हूं। निःस्वार्थ भाव से कोई काम नहीं करती। शायद इसी अमरत्व का लोभ है जो मेरी आत्मा को संतुष्ट कर सके। वही आत्मसंतुष्टि, जो मेरे हर कृत्य का कारण भी है और परिणाम भी।

मेरा लक्ष्य क्या है ये मेरे लिए मायने नहीं रखता। ये तो सिर्फ़ अलग-अलग किरदार हैं। असली तत्व तो अभिनय है, जो इन सभी किरदारों की आत्मा है। किरदार कोई भी हो, पर अभिनय करना  ही उसका मूल तथ्य है। ठीक इसी प्रकार, मेरा लक्ष्य, मेरी योजनाएँ या फिर मेरा काम किसी सीमा या परिधि में बंधा हुआ नहीं है। मैं उसे किसी बंधी-बंधायी परिभाषा में जकड़ना नहीं चाहती। वह मुक्त है क्योंकि मुझे अपनी आत्मा को मुक्त करना है हर दुख से, हर संताप से, हर विलाप से, हर ग्लानि से। मुझे अपनी आत्मा को संतुष्ट करना है स्वयं की सफलता से, स्वभाव की चंचलता से, संवेदनाओं की कोमलता से और अपने कर्म की कुशलता से।

किसी की आँखों में बहते आंसू को पोंछकर, उनके उदास चेहरों पर हंसी लाकर देखो...उसमें जो सुख मिलता है..कभी उसका आस्वादन करके देखो। जो आनंद उसमें है, वह कहीं नहीं है। मैं ज़िंदगी को, ज़िंदगी के बाद भी ज़िंदा छोड़कर जाना चाहती हूं...यही मेरा लक्ष्य है और यही मेरे समस्त कर्मों की एकमात्र इच्छा भी।




Raksha Bandhan Poem by Late Mr. Abdul Kalam (Former President of India and a great Scientist)

Sisterly love is like a full moon in glow
Soft yet soothing and fine-tunes the mood
Brotherly love is blooming sun
Brightens the life and protects homes
Merging the minds lights up the homes
Nobility in thoughts. May you live long.


Two Verses from Gitanjali by Gurudev Rabindranath Tagore

XXXV

Where the mind is without fear and the head is held high;
Where knowledge is free;
Where the world has not been broken up into fragments
by narrow domestic walls;
Where words come out from the depth of truth;
Where tireless striving stretches its arms towards perfection;
Where the clear stream of reason has not lost its way into dreary
desert sand of dead habit;
Where the mind is led forward by thee into everwidening thought and action-
Into the heaven of freedom, my father, let my country awake.

XXXVI

This is my prayer to thee, my lord - strike, strike at the root of penury in my heart.
Give me the strength lightly to bear my joys and sorrows.
Give me the strength to make my love fruitful in service.
Give me the strength never to disown the poor or bend my knees
before insolent might.
Give me the strength to raise my mind above daily trifles.
And give me the strength to surrender my strength to thy will with love.

Will religion make this world a happy place to live?

Religion is a state of mind not a set of rules. Religion is a way of living which enlightens your inner- self and makes your soul happy. Believing in God and doing your daily prayer doesn't make you a religious person. It just brings a little discipline in your life. When this discipline starts helping you to detach from outer world and connecting you with your inner-self then, it is known as meditation.

Meditation is an integral part of religion as it is the best way to know yourself. Who are you? Why are you here? Where do you came from? What is your ultimate destination? Questions are many but answers are none. This is the most crucial stage of your inner journey where you need to find the answers. You should know the cause and purpose of your existence. This self awareness will help you to find a simple and effective way to make this world a happy place to live. In a happy soul, there is no place for fear, anger, anxiety,jealousy and hatred. Happy soul is the home of love, peace and happiness. 

What if medium itself becomes barrier of communication?

I was about to express my views in class but suddenly I was running out of words? How do I structure my sentence? How do I rephrase my views? Why I am feeling helpless? My heart was filled with sorrow and grieve. The girl who has been appreciated for her communication skills is looking for appropriate words to express herself. What a shameful day. I decided to take a pause and think for a moment. What went wrong? Why am I loosing my self confidence? Is my biggest strength becoming my weakest link?

Language is the medium of expression but only if u have command over it, otherwise it becomes the biggest barrier in your communication. Although expression is important but medium is also equally important. As you know, sound also needs a medium (air) to travel so do our expressions; they need words and sentences to make someone understand them. Mother and lovers are exceptions because they don't need any medium to understand your feelings and expressions. But if you are communicating with others, you need a common language to understand each other. 

If you think collaterally on this issue, you will realize that language is not just about alphabets, words and grammer. It is the reflection of our culture, behaviour, thought process and most important our personality. You can learn language but how can you learn these things. It's a difficult task but not impossible as you know we humans are very adjusting by nature. Thumb rule of life is, if you can't dominate then adjust with your surroundings. It will increase your survivality chances manifolds. 

So if you are struggling with a new language then, first try to understand the cultural aspect of that language. Gradually, you will be able to align your thought process acoordingly and very soon you will express your feelings in that language. Its not going to happen overnight. You have to invest your time and feelings to develop an emotional connection with the language concerned. Open your mind and heart to welcome a new knowledgeable friend who can help you to communicate with millions of people around this world. Be global, think global and speak global.  
               


Knowing and exploring your own special qualities

Sometimes I feel like a small drop in this vast ocean of knowledge. There is so much to learn, absorb and explore but little we do to satisfy our own quest to learn. Unfortunetly we waste our precious time, energy and skill in unproductive things. Without a definite thought-process and desirable destination, we behave like an aimless creature. Have you ever asked yourself why am I supposed to do this? What if not doing this and doing something else? Will it make a difference in my life or not? May be I am sounding like a philosopher but I am not because these are the basic questions related to anyone's life.I believe God has given each and every person some of the qualities to make them special. Despite of knowing our very own special qualities we opt for something else in our lives. Why?